क्या वोट बैंक खोने के डर से मजदूरों के मुद्दे पर भाजपा की जगह कांग्रेस पर हमलावर हैं मायावती

मजदूरों और छात्रों को उनके घर पहुंचाने के लिए बसों पर हुई राजनीति के बाद बसपा प्रमुख मायावती एक बार फिर कांग्रेस पर आक्रामक हो गई हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि उत्तर प्रदेश में चौथे नंबर की पार्टी कांग्रेस उनके निशाने पर लगातार क्यों बनी हुई है? बसपा सुप्रीमो मायावती की ओर से शनिवार को जारी बयान में भी कहा गया है कि आजादी के बाद से लेकर आज तक करोड़ों श्रमिकों की जो दुर्दशा है उसकी असली कसूरवार कांग्रेस ही है।

दूसरी ओर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा है कि भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली की कीमत लोगों को अपने जान माल से चुकानी पड़ रही है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि सपा का सरकार विरोध भी सोशल मीडिया तक सीमित है और उत्तर प्रदेश की जातिवादी राजनीति में मायावती को डर है कि उनका वोट बैंक कहीं कांग्रेस के खाते में न चला जाए। 1990 के दशक से पहले तक प्रदेश में कांग्रेस के लगातार वर्चस्व के पीछे दलितों, अल्पसंख्यकों और ब्राह्मणों का वोट बैंक था। बसपा के उदय के बाद दलित कांग्रेस से हटकर बसपा के पास आ गए, ब्राह्मण भाजपा के पास चले गए और अल्पसंख्यक सपा, बसपा और कांग्रेस के बीच बंट गए थे।

2004 के बाद बसपा ने ब्राह्मणों के बीच अच्छी पैठ बनाई और सर्वसमाज को जोड़ने का नारा दे वह 2007 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने में कामयाब हुई। तब पहली बार उसे 30.4 प्रतिशत वोट और 206 सीटें मिली। उसके बाद से बसपा का प्रदर्शन लगातार गिरता ही जा रहा है। 2012 के विधानसभा चुनाव में 25.9 प्रतिशत वोट (80 सीटें) मिले, 2014 लोकसभा चुनाव में 20 प्रतिशत ( शून्य सीटें), 2017 विधानसभा चुनाव में 22 (19 सीटें) और पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन के बावजूद केवल 19.3 प्रतिशत वोट (10 सीटें) मिले।

इस चुनाव में भाजपा को 49.6 प्रतिशत और कांग्रेस को महज 6 प्रतिशत वोट मिले और वह सोनिया गांधी की एकमात्र रायबरेली सीट जीत पाई। इसके बावजूद यदि बसपा कांग्रेस पर हमलावर है तो उसके पीछे मायावती का दलित वोट बैंक के खिसक कर कांग्रेस के पास चले जाने का डर है।

यादव परिवार के खिलाफ लगातार संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि समाजवादी पार्टी किसी हद तक नेपथ्य में चली गई है। इसकी एक वजह पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में चल रही सीबीआई जांच और अदालतों में लंबित मुकदमे हैं।

गरीब और मजदूरों की राजनीति में अपना भविष्य तलाश रही कांग्रेस

  • यूपी की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले प्रयागराज स्थित डॉक्टर गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर बद्री नारायण कहते हैं- ‘कांशीराम ने दलितों के साथ-साथ अति पिछड़ों और अन्य जातियों का एक इंद्रधनुषीय संगठन बनाया था, जिसे मायावती ने केवल दलितों की पार्टी बना कर रख दिया। अब यदि दलित भी उनका साथ छोड़ गए तो मायावती की राजनीति के लिए अस्तित्व का संकट सामने होगा। यही वजह है कि वे भाजपा से अधिक कांग्रेस पर हमलावर हो रही हैं। हाल ही जब प्रियंका ने प्रवासी मजदूरों के लिए 1000 बसों के इंतजाम करने का ऑफर दिया। तब भी मायावती कांग्रेस के खिलाफ और योगी आदित्यनाथ सरकार के पक्ष में खड़ी दिखाई दी थीं।'
  • 'राहुल गांधी भी लगातार प्रवासी मजदूरों से बातचीत कर रहे हैं जिसे मायावती उनका नाटक करार दे रही हैं। यूपी के छात्रों को बसें उपलब्ध कराने पर राजस्थान सरकार द्वारा वसूली गई फीस को लेकर भी वे कांग्रेस पर हमलावर हो गईं। डॉ. बद्री कहते हैं कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जड़ों की ओर जा रही है। वह जाति और संप्रदाय की राजनीति से हटकर (गरीब और मजदूर) वर्ग की राजनीति में अपना भविष्य तलाशने की कोशिश कर रही है। मायावती को डर है कि श्रमिकों के साथ दलित भी कांग्रेस की ओर आकर्षित न हो जाएं।'


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Is Mayawati attacking Congress instead of BJP for fear of losing vote bank


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