मई में 2 करोड़ और जून में 7 करोड़ नौकरियां आईं, इनमें से 64% से ज्यादा छोटे दुकानदार और दिहाड़ी मजदूर

कोरोना को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन की वजह से देशभर में 12 करोड़ से ज्यादा लोगों की नौकरियां चली गई थीं। हालांकि, अच्छी बात ये रही कि लॉकडाउन में ढील मिलते ही और फिर से काम पटरी पर लौटते ही इनमें से 75% से ज्यादा नौकरियां लौट आईं।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी सीएमआईई के डेटा के मुताबिक, मई में 2 करोड़ से ज्यादा और जून में 7 करोड़नौकरियां आई हैं। इस हिसाब से अप्रैल में लॉकडाउन के कारण जो 12.2 करोड़ नौकरियां गई थीं, उनमें से 9.1 करोड़नौकरियां दोबारा आ गई हैं।

हालांकि, कोरोना की वजह से देश में अभी भी 2019-20 की तुलना में कम नौकरियां हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 2019-20 में देश में 40.4 करोड़ नौकरियां थीं, जबकि जून 2020 में 37.4 करोड़ नौकरियां हैं। यानी पिछले साल तक जितने लोगों के पास नौकरियां थीं, उनमें से 7.4% लोगों के पास अभी रोजगार नहीं है।

जून में 63% से ज्यादा नौकरियां डेली वेजर्स को मिलीं
सीएमआईई के डेटा के मुताबिक, जून 2020 में जो 7 करोड़ नौकरियां आईं हैं, उनमें से 4.44 करोड़ नौकरियां डेली वेजर्स को मिली हैं। यानी ऐसे लोग जिनकी कमाई रोज होती है। इसमें छोटे दुकानदार और दिहाड़ी मजदूर आते हैं।

इसका मतलब हुआ कि 7 करोड़ नौकरियों में से 63% से ज्यादा नौकरियां डेली वेजर्स के लिए आई हैं। वहीं, मई में आने वाली कुल नौकरियों में से 68% नौकरियां डेली वेजर्स की थीं।

सीएमआईई के सीईओ और मैनेजिंग डायरेक्टर महेश व्यास के मुताबिक, भारत में जितने भी रोजगार हैं, उनमें से 75% से ज्यादा रोजगार डेली वेजर्स के ही हैं। अप्रैल में जब पूरा महीना कम्प्लीट लॉकडाउन था, तब भी 90% से ज्यादा नौकरियां रोज कमाने वालों की ही गई थीं। और जब लॉकडाउन खुल गया है तो जाहिर है कि इनकी नौकरियां भी वापस लौटी हैं।कुल मिलाकर मई और जून में जितने भी रोजगार आए हैं, उनमें 64% रोजगार डेली वेजर्स के ही लौटे हैं।

खेती-किसानी में लगातार बढ़ रही हैं नौकरियां
एक तरफ जब लॉकडाउन में हर क्षेत्र में नौकरियां घट रही थीं, उसके उलट खेती-किसानी में नौकरियां बढ़ रही थीं। अप्रैल की तुलना में मई में खेती-किसानी में 14 लाख नई नौकरियां आई थीं। जबकि, जून में 1 करोड़ से ज्यादा नौकरियां इसी क्षेत्र में आईं।

2019-20 में देशभर में खेती-किसानी में औसतन 11 करोड़ से ज्यादा लोग काम कर रहे थे, जिनकी संख्या जून 2020 में बढ़कर 13 करोड़ पहुंच गई है। ये अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

लेकिन, सैलरीड क्लास लोगों की नौकरियां अभी भी नहीं लौटीं
2019-20 में देशभर में 8.6 करोड़ लोग ऐसे रोजगार में थे, जिन्हें हर महीने सैलरी मिलती थी। लेकिन, मई 2020 में इनकी संख्या घटकर 7 करोड़ से भी कम हो गई है। अप्रैल में 1.77 करोड़ और मई में 1.78 करोड़ नौकरियां सैलरीड क्लास के लोगों की ही गईं। यानी कुल मिलाकर साढ़े 3 करोड़ से ज्यादा नौकरियां सिर्फ अप्रैल और मई में ही चली गईं।

लेकिन, दिक्कत ये भी है कि जिन लोगों की नौकरियां गईं, उनमें से सिर्फ 39 लाख लोगों की नौकरियां ही जून में आईं। ऐसा इसलिए भी क्योंकि सैलरीड क्लास को दोबारा नई नौकरी मिलने में परेशानी भी आती है।

एक और स्टडी में अनुमान, लॉकडाउन-1 और 2 में 19.5करोड़ रोजगारों पर खतरा
कोरोना को फैलने से रोकने के लिए देश में 4 लॉकडाउन लगाए गए। पहला लॉकडाउन 25 मार्च से 14 अप्रैल तक और दूसरा लॉकडाउन 15 अप्रैल से 3 मई तक रहा। इसके बाद 4 मई से 17 मई तक तीसरा लॉकडाउन और 18 मई से 31 मई तक चौथा लॉकडाउन रहा। इसके बाद 1 जून से देश को अनलॉक करने की प्रोसेस शुरू हुई।

लॉकडाउन-1 और लॉकडाउन-2 का जॉब मार्केट में कितना असर रहा? इस पर इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च ने एक स्टडी की थी। इस स्टडी के मुताबिक, दोनों लॉकडाउन के दौरान देशभर में 19.5 करोड़ कामगारों की नौकरी जाने का खतरा था।

पहले लॉकडाउन में 11.6 करोड़ और दूसरे लॉकडाउन में 7.9 करोड़ कामगारों की नौकरी पर संकट था। स्टडी की मानें तो देशभर में 46 करोड़ से ज्यादा कामगार हैं और जिनकी नौकरियों पर खतरा था, उनकी संख्या 42% के आसपास होती है।

काम नहीं था, तो इससे 38 हजार करोड़ रुपए मासिक मजदूरी का नुकसान
इस स्टडी में ये भी कहा गया है कि लॉकडाउन-1 और लॉकडाउन-2 में काम न मिलने की वजह से 33 हजार 800 करोड़ रुपए की मासिक मजदूरी का नुकसान हुआ है। इसमें से पहले लॉकडाउन में करीब 22 हजार करोड़ और दूसरे लॉकडाउन में 11 हजार 800 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

इसको ऐसे समझ सकते हैं कि अगर लॉकडाउन-1 और लॉकडाउन-2 के दौरान कामगारों को मिलने वाले 33 हजार 800 करोड़ रुपए नहीं मिले। यानी सीधे-सीधे तौर पर नुकसान तो कामगारों का ही हुआ।

इतना ही नहीं, स्टडी में ये भी अनुमान लगाया गया है कि अगर यही कामगार अगले 6 महीने तक भी कहीं काम नहीं करते हैं, तो इससे करीब 2 लाख करोड़ रुपए की मासिक मजदूरी का नुकसान होगा।



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