असम के 33 में से 26 जिले भारी बारिश, भीषण बाढ़ और भूस्खलन की चपेट में हैं। इससे अब तक यहां 105 लोगों की मौत हो चुकी है। करीब 27.64 लोग प्रभावित हैं। राहत शिविरों में करीब 18 हजार लोग हैं। डिब्रूगढ़ जिले के रोंगमोला गांव के श्यामल दास (39) दो दिन पहले राहत शिविर से घर लौटे हैं। बाढ़ के कारण बांस, टीन की छत से बना उनका घर लगभग पूरी तरह खराब हो गया है। पत्नी और दो बच्चों के साथ श्यामल घर तो लौट आए हैं, लेकिन अब रोजगार की चिंता सता रही है।

श्यामल ने कहा, ‘लॉकडाउन के बाद से ही कामधंधा चौपट हो गया था। अब बाढ़ ने जिंदगी तबाह कर दी। छोटी सी किराने की दुकान चलाकर परिवार का गुजारा कर रहा था। अब आगे के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। खेत की जमीन पहले ही बाढ़ और भूकटाव में चली गई। छह दिन से हम सुहागी देवी स्कूल में बनाए गए अस्थायी शिविर में रह रहे थे। संक्रमण के खतरे के कारण घरों में बाढ़ का पानी कम होते ही लौट आए। हमेशा यह डर सताता था कि शिविर में कहीं कोरोना न फैल जाए।

कुछ लोग तंबू बनाकर ऊंची जगहों पर रहने लगे

कुछ बाढ़ पीड़ित लोग ऊंची जगह पर प्लास्टिक तिरपाल से तंबू बनाकर रह रहे थे, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग बनी रहे। हम 1998 से लगातार हर साल बाढ़ के समय राहत शिविरों में शरण लेते आ रहे हैं, लेकिन इतना डर कभी नहीं लगा।’ श्यामल के गांव से महज दो किमी दूर मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल का पैतृक गांव मुलुक है। यहां भी बाढ़ ने तबाही मचाई है। यहां करीब 100 बाढ़ प्रभावित परिवारों ने स्थानीय बिष्णु राभा सभागार में शरण ली है।

कोरोना के चलते मजदूरी नहीं कर रहे

छय जिले के डेब्रीडूवा गांव के अदालत खान कहते हैं, ‘पिछले एक महीने से बच्चों के साथ राहत शिविर में हूं। खेत और घर बाढ़ में डूब चुके हैं। कोरोना के कारण कहीं मजदूरी करने नहीं जा सकते। ऐसे संकट के दौरान सरकार भी मदद नहीं करेगी तो हम भूखे मर जाएंगे। इलाके के विधायक सुध लेने नहीं आए। चुनाव में सभी दल वोट मांगने जरूर आते हैं, क्योंकि डेब्रीडूवा में 8 हजार वोट हैं।’

बरपेटा जिले के सिधोनी गांव के मोहम्मद नयन अली (47) कहते हैं, ‘प्रशासन ने 15 दिनों में केवल एक बार प्रति व्यक्ति एक किलो चावल और 200 ग्राम दाल दिया। उसके बाद हमारा हाल जानने कोई नहीं आया।’ बरपेटा जिले में बाढ़ से ज्यादा तबाही का एक कारण भूटान के कुरिचू हाइड्रोपावर प्लांट से छोड़े गए पानी को बताया जा रहा है।

12 लाख लोग बाढ़ की चपेट में

बरपेटा जिला उपायुक्त मुनींद्र शर्मा ने इसकी पुष्टि की है। वे कहते है, ‘हमारे जिले में करीब 739 गांव बाढ़ से प्रभावित हैं। करीब 12 लाख लोग बाढ़ की चपेट में हैं। कुल 15 लोगों की जान गई है। भूटान 10 दिन से लगातार पानी छोड़ रहा है। अगर वह रोजाना 1000 से 1500 क्यूमेक्स पानी छोड़ेगा तो स्थिति और खराब होगी।’ उधर, बाढ़ के कारण काजीरंगा नेशनल पार्क में 96 जानवरों की मौत हो चुकी है।

पार्क के कुल 223 शिविरों में से 99 शिविर बाढ़ में डूब गए हैं। छह शिविर खाली कराने पड़े हैं। इधर, असम के मुख्य सचिव कुमार संजय कृष्णा कहते हैं, ‘जिला प्रशासन के अधिकारियों से कहा है कि वे राहत शिविरों में सोशल डिस्टेंसिंग की पूरी व्यवस्था कराएं। राहत शिविर बनाने के लिए पहले ही ऐसे स्थान चुने गए थे, जहां जरूरत होने पर क्वारेंटाइन सेंटर बनाया जा सके। पहले की तुलना में इस बार कोरोना के कारण बाढ़ की चुनौती बड़ी है।

इतनी बढ़ी संख्या में प्रभावित लोगों को कोरोना गाइडलाइन के तहत राहत शिविरों तक सुरक्षित लाना आसान नहीं हैं। फिर भी सावधानियां बरत रहे हैं।’ राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के स्टेट प्रोजेक्ट को-ऑर्डिनेटर पंकज चक्रवर्ती ने कहा कि कई इलाकों में बाढ़ का पानी कम हुआ है, लेकिन निचले असम में पानी का स्तर खतरे के निशान से ऊपर है।’ ग्वालपाड़ा जिला उपायुक्त वर्नाली डेका कहती हैं, ‘शिविरों के प्रभारियों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे सोशल डिस्टेंसिंग के पालन की जानकारी देते रहें।’

असम का 40% हिस्सा बाढ़ प्रभावित, हर साल 50-60 लाख लोगों पर पड़ता है असर

  • राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के मुताबिक, असम का 31 हजार 500 वर्ग किमी हिस्सा बाढ़ प्रभावित है। यानी करीब 40% हिस्सा चपेट में है। इसकी बड़ी वजह असम पूरी तरह से नदी घाटी पर ही बसा हुआ है। इसका कुल क्षेत्रफल 78 हजार 438 वर्ग किमी है। जिसमें से 56 हजार 194 वर्ग किमी ब्रह्मपुत्र नदी घाटी में है। और बाकी 22 हजार 244 वर्ग किमी बराक नदी घाटी में है।
  • हर साल बाढ़ की वजह से असम को करीब 200 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। 1998 की बाढ़ में 500 करोड़ और 2004 में 771 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था। असम सरकार के मुताबिक 1954,1962, 1972, 1977, 1984, 1988, 1998, 2002 और 2004 में राज्य ने भयंकर बाढ़ झेली है। उसके बाद भी हर साल तीन से चार बार बाढ़ की स्थिति बनती है।
  • साढ़े तीन करोड़ आबादी वाले राज्य में हर साल 50-60 लाख लोग प्रभावित होते हैं। गृह मंत्रालय केे अनुसार 22 मई से 15 जुलाई के दौरान राज्य के 4 हजार 766 गांव बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।


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असम का 40% हिस्सा बाढ़ प्रभावित,  हर साल 50-60 लाख लोगों पर पड़ता है असर।


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