बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है, लेकिन एनडीए में सीटों के बंटवारे का काम अभी तक नहीं हो पाया है। सीट बंटवारे को लेकर सहयोगी दलों के बीच नूरा-कुश्ती चल रही है। बिहार के कुमार और लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग आर-पार के मूड में नजर आ रहे हैं। इस सबके बीच भाजपा इंतजार करो की नीति अपनाए हुए है।

एनडीए में झगड़ा जदयू और लोजपा के बीच ही है। लोजपा का कहना है कि नीतीश के साथ गठबंधन पर फैसला चिराग पासवान लेंगे। साथ ही लोजपा राज्य में 143 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति भी बना रही है। वहीं, जदयू के बड़े नेता चिराग पर हमलावर हैं। उनके बयानों से साफ है कि नीतीश कुमार इस बार चिराग को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं।

हालांकि, इस पूरे विवाद पर नीतीश के अजीज और राज्य के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का कहना है कि यह झगड़ा क्षणिक है। जल्द ही सबकुछ सुलझा लिया जाएगा। बिहार में गठबंधन मजबूरी नहीं है, बल्कि जरूरत है। यहां अकेले कोई भी दल सरकार नहीं बना सकता।

सुशील मोदी कुछ भी कहें, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि बिहार में हर बार की तरह इस बार भी मजबूरी का नाम एनडीए है। वरिष्ठ पत्रकार और लंबे वक्त से बिहार की राजनीति को करीब से देख रहे अरविंद मोहन कहते हैं कि भाजपा की नीतीश मजबूरी हैं, क्योंकि उनके पास राज्य में कोई बड़ा लीडर नहीं है।

सुशील मोदी हैं, लेकिन वे केंद्रीय लीडरशिप को पसंद नहीं। रही बात नीतीश की, तो उन्हें दूसरों के साथ ही सवारी करनी है। भाजपा-जदयू के बीच अंधा और लंगड़े वाली दोस्ती है। दैनिक भास्कर के बिहार स्टेट एडिटर और करीब 7 साल से राज्य की राजनीति पर नजर रख रहे सतीश सिंह कहते हैं कि चिराग पासवान ने एनडीए के साथ थर्ड फ्रंट का भी रास्ता खोज रखा है।

यदि एनडीए में उन्हें सम्मानजनक सीटें नहीं मिलती दिखीं तो वे नए रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं।

बिहार एनडीए में पिछले आम चुनाव से ही सबकुछ ठीक नहीं है

बिहार एनडीए में पिछले लोकसभा चुनाव से ही सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। पहले राज्य की 40 लोकसभा सीटों के बंटवारे को लेकर भाजपा- जदयू-लोजपा में नोकझोंक होती रही, फिर मोदी 2.0 सरकार के कैबिनेट में नीतीश ने अपने एक भी सांसद को मंत्री बनने के लिए नहीं भेजा। इसके साथ ही नीतीश ने इशारों-इशारों में मोदी-शाह टीम को बता दिया कि आप केंद्र की राजनीति करें, हमें बिहार की करने दें।

कुशवाहा और चिराग के बीच हो रही ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री रहने की डील

सतीश सिंह बताते हैं कि थर्ड फ्रंट में चिराग की लोक जनशक्ति पार्टी, उपेंद्र कुशवाह की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी और मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी शामिल हो सकती है।

उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान के बीच ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बनने के फॉर्मूले पर भी बात हो रही है। पप्पू यादव कॉर्डिनेटर की भूमिका में हैं। लोजपा के साथ जो पार्टियां थर्ड फ्रंट में आ सकती हैं, वो कुछ समय पहले तक महागठबंधन का हिस्सा रही हैं।

हालांकि, उपेंद्र कुशवाहा की नीतीश कुमार से भी बातचीत चल रही है। लेकिन इसमें उपेंद्र कुशवाहा की ज्यादा सीट पाने की महत्वाकांक्षा आड़े आ सकती है। ऐसा पिछले लोकसभा चुनाव में भी हुआ था, तब उन्होंने केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद एनडीए छोड़ दिया था। दरअसल, कुशवाहा केंद्र की राजनीति से ज्यादा बिहार की राजनीति में दखल रखना चाहते हैं।

एनडीए में दरार अंदरूनी है

जिस तरह जदयू केंद्र सरकार में शामिल नहीं है, उसी तरह लोजपा बिहार सरकार में साझीदार नहीं है। इससे बिहार एनडीए के तीनों दलों में अंदरूनी दूरी या दरार की झलक कभी-कभी साफ दिखाई देती है।

वहीं, केंद्र में बुलंद, लेकिन बिहार में मंद पड़ी भाजपा नीतीश कुमार की ‘पिछलग्गू’ वाली पीड़ा से मुक्ति तो चाहती है, पर खुलकर बोल नहीं पा रही। इस पर सतीश सिंह कहते हैं कि लोजपा दबाव की राजनीति तो हर बार करती है, लेकिन इस बार वह भाजपा के इशारे पर काम कर रही है।

लोजपा यह पहले ही साफ कर चुकी है कि यदि वह अकेली चुनाव में जाती है तो केंद्र में एनडीए से बाहर नहीं होगी। इसका मतलब साफ है कि राज्य में भाजपा-लोजपा का मुकाबला फ्रेंडली होगा। इसी तरह झारखंड में भी हुआ था।

उधर, शुक्रवार को भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि चिराग पासवान युवा हैं और सही राजनीतिक सोच के साथ काम करने वाले हैं। लोजपा 200% एनडीए में है और आगे भी रहेगी। इसमें कोई संदेह नहीं है।

वहीं, जदयू को भाजपा का रवैया नहीं भा रहा है। खासकर लोजपा को लेकर। जदयू नेताओं का कहना है कि चिराग पासवान बार-बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला कर रहे हैं और भाजपा उन्हें रोक-टोक भी नहीं रही है।

पिछले साल जून में नीतीश ने कैबिनेट विस्तार किया, पर भाजपा के एक भी मंत्री को नहीं शामिल किया

पिछले साल 2 जून को बिहार में नीतीश सरकार के कैबिनेट का विस्तार हुआ। लेकिन इसमें भाजपा का एक भी मंत्री शामिल नहीं हुआ। जदयू के 8 नए मंत्रियों ने शपथ ली थी। नीतीश ने भाजपा और लोजपा को एक भी मंत्री पद नहीं दिया।

नीतीश कुमार जुलाई 2017 में महागठबंधन छोड़कर एनडीए में शामिल हुए थे, इसके बाद यह सरकार का दूसरा कैबिनेट विस्तार था। तब शपथ के ठीक बाद जदयू प्रवक्ता केसी त्यागी ने कहा था कि हम भविष्य में भी केंद्र की एनडीए सरकार में शामिल नहीं होंगे।

अरविंद मोहन कहते हैं, लोकतंत्र में हर वोट की वैल्यू दो होती है। ध्रुवीकरण वोटर की ताकत ज्यादा होती है, उसका फायदा भाजपा को ही होता है। यह बात जदयू को पता है, इसलिए वह भाजपा के साथ ही बनी हुई है।

2019 लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे को फाइनल करने के लिए नीतीश को दिल्ली जाना पड़ा था

2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भी बिहार में सीटों के बंटवारे को लेकर ताबड़तोड़ राजनीति हुई। तब बिहार में एनडीए के चार घटक दल थे। इनमें भाजपा, जदयू, लोजपा और रालोसपा शामिल थी। लेकिन इनके बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला तय करने के लिए पटना से लेकर दिल्ली तक भागदौड़ होती रही।

आखिरकार नीतीश को खुद दिल्ली जाना पड़ा, तब जाकर भाजपा-जदयू-लोजपा के बीच 17-17-6 फॉर्मूले के तहत सीटें बटी थीं। जदयू आखिर तक 25 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा ठोक रही थी। लेकिन इस सबके बीच रालोसपा एनडीए छोड़ गई।

सतीश सिंह कहते हैं कि इस बार भाजपा-जदयू और जीतनराम मांझी की ‘हम’ का एक साथ चुनाव लड़ना लगभग तय है। बस बात लोजपा की तरफ से फंस रही है। लोजपा यदि एनडीए से टूटती है तो जदयू के वोट में सेंध निश्चित है। दरअसल, बिहार की करीब-करीब हर सीट पर पासवान के कम से कम 8 से 10 हजार वोट हैं।

अरविंद मोहन कहते हैं कि लोजपा 143 सीटों पर लड़ने की बात कर रही है तो बहुत हद तक संभव है कि वो भाजपा के खिलाफ अपने उम्मीदवार न उतारे। लोजपा दबाव की राजनीति इसलिए करती है, क्योंकि उसे अपना भविष्य देखना है। उसके पास राज्य में 5 से 10% वोट हैं। इस बार दलित पॉलिटिक्स पर निर्भर करता है, किसकी सरकार बनेगी। जिस तरफ दलित जाएंगे, उसकी ही सरकार बनेगी।

2020 में चार दलों का गठबंधन बन रहा संकट

2020 में यदि चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और नीतीश एनडीए के साथ रहे तो सीट शेयरिंग का फॉर्मूला काफी जटिल होने जा रहा है। राज्य में 243 सीटें हैं। भाजपा के अभी राज्य में 53 विधायक हैं। 2015 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 157 सीटों पर चुनाव लड़ा था।

लोजपा 42 सीटों पर लड़ी थी, इनमें से 2 पर जीत हासिल कर सकी। जदयू 101 सीटों पर लड़ी थी और 71 विधायक चुने गए थे। हालांकि, पिछले विधानसभा चुनाव में जदयू ने एनडीए से अलग होकर राजद-कांग्रेस के साथ महागठबंधन किया था।

सतीश सिंह कहते हैं कि भाजपा ने इस बार जदयू से साफ कह दिया कि वह राज्य में बराबर सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी। इसलिए मामला सिर्फ सहयोगी दलों की सीटों को लेकर ही फंसा है। वहीं, जदयू भाजपा की रणनीति से डर रही है। उसे लग रहा है कि यदि राज्य में भाजपा ने ज्यादा सीटें हासिल कर लीं तो वो चुनाव के बाद सीएम पद भी मांग सकती है। वैसे भी राज्य में हमेशा से भाजपा का स्ट्राइक रेट जदयू से बेहतर रहा है।

फैक्ट क्या कहते हैं?

  • 2019 आम चुनाव में भाजपा का रिकॉर्ड जदयू से बेहतर था

2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने कोटे की सभी 17 सीटों पर जीत हासिल की थी। जदयू को 17 में से 16 सीटों पर जीत मिली थी। वहीं, लोजपा ने अपने कोटे की सभी 6 सीटें जीत ली थीं।

  • 2014 आम चुनाव में जदयू 40 में से सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी

बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। 2014 में नीतीश कुमार एनडीए के साथ नहीं, बल्कि अकेले लड़े थे। एनडीए में भाजपा, रालोसपा, लोजपा और उस समय जीतनराम मांझी की पार्टी हम शामिल थी। भाजपा 29, लोजपा 7 और रालोसपा 4 पर लड़ी थी, जबकि जदयू ने अकेले चुनाव लड़ा था और 40 में से सिर्फ 2 पर उसे जीत मिली थी। भाजपा 29 में 22 सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही थी।

  • 2009 में जदयू 25 और भाजपा 15 पर लड़ी थी

2009 के लोकसभा चुनाव में जदयू और भाजपा के गठबंधन ने एक साथ चुनाव लड़ा था। नीतीश की पार्टी 25 सीटों पर चुनाव लड़ी, जिसमें 20 पर जीत मिली थी और भाजपा 15 पर लड़कर 12 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। 2004 में जदयू और भाजपा के बीच सीट फॉर्मूला 26-14 था।

  • भाजपा का सीट जीतने का औसत जदयू से बेहतर

2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू सहयोगी थे। इसमें भाजपा, जदयू से कम सीटों पर चुनाव लड़ी थी, लेकिन उसके जीतने का औसत जदयू से बेहतर रहा था। भाजपा 102 सीटों पर चुनाव लड़ी और 91 जीतने में सफल रही, जबकि जदयू 141 सीटों पर चुनाव लड़कर 115 जीतने पर सफल रही थी। इसी तरह 2009 के लोकसभा चुनाव में जदयू 25 सीटों पर चुनाव लड़ी और 20 जीती, जबकि भाजपा ने 15 में से 12 जीती थी।



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