मेरा एक दोस्त दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली अपनी बेटी के स्कूल के बाहर खड़ा था। स्कूल छूटा, बच्चे बाहर आने लगे, दूर से बिटिया आती दिखी। तभी पीछे से उसी की क्लास का एक लड़का आया, दोनों में कुछ कहासुनी हुई, लड़के ने लड़की को एक थप्पड़ सीधा गाल पर मार दिया।

लड़की को गुस्सा आया, उसने भी पलटकर मारा। लड़के ने उसका हाथ मरोड़ दिया। इस बार तो लड़की का गुस्सा सातवें आसमान पर। उसने दनादन थप्पड़ों की बरसात कर दी। लड़के को धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया, फिर हाथ-लात सबसे मरम्मत कर डाली।

जब तक दोनों बच्चों के पैरेंट्स उन तक पहुंचते, लड़का मम्मी-मम्मी करता जमीन पर लोट रहा था। दोनों बच्चे दूसरी कक्षा में पढ़ते थे, एक लड़का था, एक लड़की। लड़की, जिसे बचपन से सिखाया जाता है कि लड़कियां कमजोर होती हैं। और लड़का, जिसे बचपन से ये सिखाया जाता है कि लड़के रोते नहीं।

दोस्त ने फोन करके पूरा वाकया बयान किया और बोला, 'मेरी बेटी ने लड़के को धूल चटा दी, अब बताओ, लड़कियां कमजोर होती हैं।' और मैं सोचने लगी, कितना फर्क पड़ता है इस बात से कि एक लड़की को कैसे पाला गया। उसे क्या सिखाया गया। क्या मूल्य, क्या विश्वास दिए गए। उसे कमजोर बनाया, चुप रहना सिखाया, दबना सिखाया, सहना सिखाया, या पलटकर जवाब देना सिखाया, लड़ना सिखाया। उसे गोल रोटी बनाना सिखाया या छेड़खानी करने वाले का मुंह गोल कर देना।

बचपन में एक बार मेरे पापा और बुआ की लड़ाई हो गई। गलती पापा की थी, उन्होंने बुआ को मारा था। बुआ जिद करके बैठ गईं, या तो आज ये खाना खाएगा या मैं। दादाजी ने फरमान जारी किया, "बेटे को खाना दो। वो क्या मेरा पिंडदान करेगी। " पापा को प्रेम से बिठाकर खिलाया गया। बुआ ने उस रात खाना नहीं खाया। 40 साल बाद भी दादी जब ये कहानी सुनातीं तो यही कहतीं कि "लड़की बहुत मनबढ़ हो गई थी।"

लड़कियों को दबाकर, डराकर रखना हमारे घर का सदियों से चला आ रहा मूल्य था। मर्दों का निरंकुश राज इसी बात पर कायम था कि जरा सा बोलते ही लड़की के मुंह में ठूंठ भर दो। इसके बाद दोनों बुआओं ने ससुराल में भी बहुत दुख पाया। बेटों ने बहुओं को दुख दिया, परंपरा कायम रही।

फेसबुक पर एक क्लोज्ड विमेन ग्रुप में एक बार यूक्रेन की एक औरत ने लिखा था, "मेरे पिता नाविक थे। खुद नाव बनाते, समुद्र में लंबी यात्राओं पर जाते। उन्होंने मुझे कभी नहीं सिखाया। क्या आपके पिता भी ऐसे थे?" एक अमेरिकन लड़की ने कमेंट में लिखा कि उसने उसी आदमी से शादी की, जिसने उसका रेप किया था। उसके माता-पिता ने कहा कि अब कोई मर्द उसकी इज्जत नहीं करेगा।

अमेरिकी फेमिनिस्ट राइटर ग्लोरिया स्टाइनम ने अपने पिता के बारे में लिखा है, "पिता मेरे साथ बहुत बराबरी और सम्मान से पेश आते थे। मेरी बातों को गंभीरता से सुनते, मेरी राय को महत्व देते। मैं इस विश्वास के साथ बड़ी हुई कि मेरा महत्व है। मेरे जीवन का, मेरे काम का।"

मेरा अपना अनुभव भी यही कहता है। मैंने किताबों में तो पढ़ लिया था कि मैं कीमती हूं, मेरा जीवन कीमती है। मैं मर्दों से कम नहीं, लेकिन उस पढ़े को जिए में बदलने में बड़ी मुश्किलें आईं। अपने लिए लड़ने के हर जरूरी मौके पर मैं चूक गई। मुझे हमेशा डर लगता रहा। जीकर ही समझ आया कि एक लड़की अपनी इज्जत, ताकत और महत्व का सबक फेमिनिज्म की किताब पढ़कर नहीं सीखती। वो सिर्फ इस बात से सीखती है कि उसे कितनी इज्जत दी गई, कितना महत्व दिया गया।

2013 में मुंबई के शक्ति मिल कंपाउंड में एक फोटो जर्नलिस्ट लड़की के साथ कुछ लोगों ने रेप किया था। वो लड़की जब इलाज के बाद अस्पताल से निकल रही थी तो उसने चेहरा ढंकने से इनकार कर दिया। बोली, "शर्मिंदा मैं नहीं हूं। शर्मिंदा उन्हें होना चाहिए।" 2012 में कलकत्ता के पार्क स्ट्रीट रेप केस की शिकार सुजैट जॉर्डन ने एक बार एक इंटरव्यू में कहा था, "मेरा नाम मत छिपाना। मैं सुजैट जॉर्डन हूं। पार्क स्ट्रीट रेप विक्टिम नहीं।"

इन लड़कियों के दिल, दिमाग और जिंदगी में उधर कभी देखा नहीं किसी ने कि खुद पर यह विश्वास, यह ताकत कहां से आई थी, जबकि पूरा समाज उनके खिलाफ खड़ा था। मीडिया में छपे लेख नहीं हैं पैमाना इस बात का कि कितनी करुणा, संवेदना और आदर से देखते हैं लोग रेप का शिकार हुई महिलाओं को, पैमाना हैं आपके दोस्त, सहकर्मी, पड़ोसी, घर के लोग। ध्यान से सुनिए उनकी भाषा और झांककर देखिए उनकी आंखों में।

मैं सबको एक झाडू से नहीं बुहार रही, लेकिन उनमें से ज्यादातर आपके साथ नहीं हैं। और जब कोई न हो साथ तो खुद को खुद के साथ खड़े होना होता है। ताकत और स्वाभिमान का जो सबक हमें घरों में नहीं सिखाया गया, वो खुद से सीखना होता है। खुद पर विश्वास करना होता है। खुद से कहना होता है कि मर्द ने रेप किया, गलती तुम्हारी नहीं है। मर्द ने छेड़खानी की, गलती तुम्हारी नहीं है। मर्द ने गाली दी, हाथ उठाया, मारा, अपमानित किया, गलती तुम्हारी नहीं है।

कहानी में भले लिखा है कि द्रौपदी ने आवाज लगाई तो कृष्ण दौड़े आए। लेकिन, असल जिंदगी में कोई कृष्ण नहीं आता। अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है। अपनी सुरक्षा खुद करनी होती है। मर्द का मुंह ताकते नहीं बैठ सकते। अपनी सुरक्षा के सारे इंतजाम खुद ही चाक-चौबंद रखने होते हैं। इस डर से घर में नहीं बैठ सकते कि सड़क पर रेप हो सकता है।

इस चीज के लिए खुद को तैयार करना होता है कि कुछ हुआ तो मुकाबला कैसे करेंगे। पास में चाकू रखो, लाल मिर्च का पाउडर रखो, पेपर स्प्रे रखो। कराटे सीखो, मेहनत करो, देह को मजबूत बनाओ। जो भी जरूरी हो, अपनी रक्षा कर सकने के लिए, वो सब करो बस डरो नहीं। डरकर घर में मत दुबक जाओ। बाहर निकलो, सामना करो।

यही है असली बात। खुद से प्यार करना, खुद की इज्जत करना, खुद को ताकतवर बनाना, खुद के साथ खड़े होना और ये करने के लिए हर बार लड़ने, चिल्लाने, आवाज ऊंची करने और तलवार उठाने की जरूरत नहीं होती। बस सिर को ऊंचा रखना होता है और आत्मा को मजबूत।

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